आ गया साल है पांचवा जानिए
छा रहा है सहज मेघ ये मानिए
बूंद दो भी बरस के न जाएगा ये
मोर के जैसे शोर को छानिए
घर बनेगा उन्ही का हकीकत यही
पैर के नाप की ही चद्दर तानिेए
भूल जाएंगे वो तुझको दान को
वेवफा था सनम ज्यों उसे जानिए
और बाते बनाना उसे आ रहा
शोषको की कतारों खड़ा जानिए
राजनीती यही है न कोई सगा
आतंको की गढ़ी है पहिचानीए
राजनीति
Comments
3 responses to “राजनीति”
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राजनीती यही है न कोई सगा
आतंको की गढ़ी है पहिचानीए
__ बहुत सुंदर रचना सच्ची अभिव्यक्ति -

Thoughtful poetry
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बहुत खूब
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