रात भर

हमेशा
रात-सी खामोशी लिए
एक अजीब सी वेचैनी से
घिरी- घिरी रहती हूँ ।
निशा हो या दिवस
खुद में ही सिमटी,
सूर्य की किरणों से
कहाँ मिला करती हूँ ।

Comments

2 responses to “रात भर”

  1. अतिसुंदर रचना

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