जो मनुज होते हैं धरातल पर ही रहते हैं
जो दनुज होते हैं पवन में उड़ते रहते हैं
रावण का अहंकार जब हद से बढ़ता है,
लेकर धनुष और तीर राम संहार करते हैं
यह मत समझ तू मूढ़ बुद्धी है नहीं मेरे
बहरूपियों के हर रूप से हम परिचित रहते हैं..
“रावण का अहंकार”
Comments
5 responses to ““रावण का अहंकार””
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झूठ कितना भी तांडव कर ले
सच के आगे उसे झूकना पड़ेगा ।
क्रोध कब-तक आग बनके जलेगा
आखिर राख बनके उसे सोचना पड़ेगा ।।
कवि विकास कुमार-

Thanks a lot
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बहुत खूब
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Thanks
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बहरूपियो के हर रूप से तो हम परिचित रहते हैं
पर ना जाने क्यों सच्चाई कहने की बारे में हम कुछ भी ना कहते हैं
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