अनिश्चितता के सवालों में है मानव पङा
कैसी होगी जिन्दगी,
सुलसा भांति मुँह बाए खङा ।
कल की जिन्दगी का नहीं जन को पता
खता क्या हुई हम से,मेरे रब जरा तुम तो बता
जीवन को लीलने से पहले रूक तो ज़रा ।
कल की लालसाओ की तृष्णा की खातिर
अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति में बन बैठा शातिर
संवेदनाओं के मिटने से पहले,रूक तो ज़रा ।
अपने बेगानो की पहचान की बेला है आई
अपनों से अपनों के बीच की कैसी है खाई
संक्रमण से भागने से पहले,रूक तो ज़रा ।
दुख की घङी में किसी की मदद को हाथ जो बढे
हमदर्द है दर्द के दरिया में डूबने वाले का संबल जो बने
कर्म अपना भूलने से पहले,रूक तो ज़रा ।
सुमन आर्या
रूक तो ज़रा
Comments
8 responses to “रूक तो ज़रा”
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बेहद गंभीर रचना
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धन्यवाद
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धन्यवाद
‘सुरसा ‘ की जगह सुलसा
छप गया ।
त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी ।।
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सुन्दर
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धन्यवाद
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nice
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बहुत सुंदर रचना👏👏
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गंभीर विषय को सहायता से चित्रित किया है
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