रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना

मन के बहकावे में यदि तु बहकेगा
तो तेरा मानव जीवन व्यर्थ चला जायेगा
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रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना
रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना
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रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।1।।
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तेरे अन्दर बैठा रहता है एक देवता
तु उनकी बातों को कभी न नकारना
तुम गीता का पाठ बड़े ध्यान से करना
और उनका भाव तुम अपनी आत्मा से पुछना
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रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।2।।
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फल की आसक्ति को तु खुद पर कभी हावी ना होने देना
जो देंगे प्रभु तुम उसी में खुश रहना
हरिनाम से तु कभी विमुख न होना
सुख हो या दुख तुम सदा राम राम जपना
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रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।3।।
कवि विकास कुमार

Comments

3 responses to “रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना”

  1. अपने आपसे परिचय कराती तथा मन का मानवीकरण करती रचना

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

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