जो हो रहा है घटित
अपने चारों तरफ
उसे बयान कर दे ना
मेरी कलम! लिख दे ना।
जी रहे घर बिना
लिबास बिना,
ठंड में ओढ़नी बिना सोते
ऐसे जीवन लिए
कुछ कर दे ना,
उस दर्द को उठाने को
मेरे मन! लिख दे ना।
भूख है और खड़ी बेकारी
उनकी आवाज को
उठा दे ना
वो कलम लिख दे ना।
जो है वो कह दे ना,
मेरी कलम! लिख दे ना।
लिख दे ना
Comments
4 responses to “लिख दे ना”
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लेखनी को सम्बोधित करती हुई मानवीकरण का प्रयोग करके अपने मन के भाव व्यक्त करती हुई कविता
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Very nice poem
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असहायों की सहायता करने को तत्पर , कवि की बहुत सुन्दर रचना
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बहुत
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