इस फिजा में संवर कर लो हम आ गये,
कुछ अलग ही तेवर लेके लो हम आ गये…
थी नाराजगी यहाँ की हवाओं से हमको,
बदलकर हवाएं लो हम आ गये..
कुछ थे दुश्मन हमारे तो कुछ परवाने,
भुलाकर सभी गिले-शिकवे लो हम आ गये…
समयाभाव था मेरे जीवन में खालीपन,
लेकर थोड़ी फुर्सत लो हम आ गये…
मोहब्बत के मारे थे हम तो बेचारे,
भूलकर उस खता को लो हम आ गये…
स्वागत में हमारे हो कविता तुम्हारी,
है सावन हमारा और गीता हमारी…
हो गुलजार उपवन, है होली का मौसम,
लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये…..
“लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये”
Comments
8 responses to ““लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये””
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Oh my God thank you
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है सावन हमारा और गीता हमारी…
हो गुलजार उपवन, है होली का मौसम,
लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये…..
______होली आने से पहले होली की बधाई प्रज्ञा,स्वागत … बहुत सुंदर रचना-

Ji bilkul
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Tq
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अतिसुंदर भाव
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Tq
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बहुत ही सुंदर भाव आप तो कविता के माध्यम से जी उठती हैं प्रज्ञा जी अति उत्तम रचना
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