लोकतंत्र की जन्मस्थली,
लक्ष्वीगणतंत्र जहाँ थी बसी,
प्रलोभन नहीं जहाँ बस
काम, विकास, आत्मसम्मान की,
विजयगाथा पुनः सुनने को मिली।।
जहाँ फिर से कर्मयोगी की बयार
हर ग्राम, कस्बे, टोले से उठी
सारे अनुमान व्यर्थ, दावे सारे खोखले
मूक रहने वाली, आधी आबादी
निर्णायक भूमिका निर्वहन करतीं दिखीं
लोकतंत्र की जन्मस्थली
लक्ष्वीगणतंत्र जहाँ थी बसी।।
पाँच वर्षों के लिए फिर से
तुझे चुनकर, सत्ता पर बिठाये हैं
मत भूलना, प्रतिनिधि हो सिर्फ तुम हमारे
बिहार की शान बढ़ाने की, उम्मीद लगाए हैं
सच्चरित्रता हमारी, प्रलोभनो में न बिकी
लोकतंत्र की जन्मस्थली, लक्ष्वीगणतंत्र जहाँ थी बसी।।
सिर्फ पानी, बिजली, सङक से बात बनने वाली है नहीं
अनल पेट में लगी, खाली वादों से बुझने वाली नहीं
स्वाबलम्बी बनने की लगन, हममें है जगी
लोकतंत्र की जन्मस्थली, लक्ष्वीगणतंत्र जहाँ थीं बसी।।
एक-एक मत हमारा जब आपस में मिला
ध्वस्त होता आशियाना, देखो कैसा है खिला
देख लो दुनिया वालों, नारी शक्ति को पहचान लो
उजङो को बसाने की कला हममें, अच्छे से जान लो
पूरी करते जद हमेशा, हमने जो ठान ली
लोकतंत्र की जन्मस्थली, लक्ष्वीगणतंत्र जहाँ थीं बसी।।
लोकतंत्र की जन्मस्थली
Comments
5 responses to “लोकतंत्र की जन्मस्थली”
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लोकतंत्र पर यथार्थ परक रचना
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सादर धन्यवाद
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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सादर धन्यवाद
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सुंदर
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