सोचा था क्या हम सब ने!
ऐसा रोगी समाज ।
हर दूसरा चेहरा जैसे घिनौना आज ,
लगता कि जैसे हो गए मानसिक रोगी,
दहशत की बोलती है अब हर जगह तूती।
हर कोई आज जग में ,
अस्मत का भूखा बैठा ।
गिद्ध सी निगाहें जैसे एक्स-रे करेगा ,
मां-बाप गुरु भाई सब हो गए कसाई,
इंटरनेट व मोबाइल नहीं असली प्रलय मचाई।
लगता है बाढ़ राज्यों में नहीं पूरे देश में है आई ।
राक्षसों की पूरी फौज को अपने साथ बहाकर लाई। निमिषा सिंह
वहशी समाज
Comments
13 responses to “वहशी समाज”
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Nice
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Thanks
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Good
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Thanks
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सत्य का परिचय
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😀
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अति उत्तम
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर रचना
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Thank you
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Sunder
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Khoob
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Very nice
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