विडम्बना

जिम्मेदारों!!
यूँ उलझ कर आप आपस में
भुला देते हो जनहित को।
बिता देते हो ऐसे ही समय।
खींचातानी गजब की है
आपकी जो भूल कर
आम जीवन के दर्दों को
अलग मुद्दे उठाते हो
हँसाने की जगह
केवल रुलाते हो।
अहिंसा सत्य की बातें
समभाव की बातें
किनारे फेंक देते हो
भिड़े लड़े आपस में समाज
ऐसा यत्न करते हो।

Comments

8 responses to “विडम्बना”

  1. Praduman Amit

    सुंदर भाव ।

    1. Satish Chandra Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Chandra Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Ekta

    बहुत सुंदर लेखन

    1. Satish Chandra Pandey

      शुक्रिया

  3. Amita Gupta

    सत्यपरक रचना 👌👌

    1. Satish Chandra Pandey

      Thank you very much

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