विदाई

कर चले मेरी महफ़िल को सूना
क्या खता हो गई आज मुझसे,
इस तरह क्यों चले जा रहे हो
क्या खता हो गई आज मुझसे।
जिंदगी भी समझ से परे है
समझ से परे है विदाई,
साथ रहते हैं, जीते हैं लेकिन
एक दिन छीन लेती विदाई।
दूर होना सभी को है लेकिन
कौन रोकेगा ह्रदय के गम को,
थाम लूंगा कलेजा स्वयं का
थाम पाउँगा मुश्किल से मन को।
—- डॉ. सतीश पांडेय

Comments

7 responses to “विदाई”

  1. बिछोह पर बहुत ही सुंदर पंक्तियां

    1. सादर आभार व्यक्त करता हूँ

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Atisunder

    1. सादर धन्यवाद जी

  3. वियोग रस का सुन्दर प्रयोग

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