भरी दोपहरी की धूप में
जिस तरह सूखने की बजाय
गीला हो जाता है पसीने से
बदन,
ठीक उसी तरह
भरी बरसात में
हरा-भरा न होकर
सुख गया है मन।
विपरीत
Comments
9 responses to “विपरीत”
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सुख की जगह सूख होना चाहिए, बाकी सुन्दर विपरीतार्थक बन रहा है
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भरी दोपहरी की धूप में
जिस तरह सूखने की बजाय
गीला हो जाता है पसीने से
बदन,
ठीक उसी तरह
भरी बरसात में
हरा-भरा न होकर
सूख गया है मन।-
सही कहा आपने
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विरोधाभास का सुंदर प्रयोग
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सादर धन्यवाद
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👍👍
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सूख।
बाकी सब कुछ बेहतरीन है-
👏
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👍
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