विपरीत

भरी दोपहरी की धूप में
जिस तरह सूखने की बजाय
गीला हो जाता है पसीने से
बदन,
ठीक उसी तरह
भरी बरसात में
हरा-भरा न होकर
सुख गया है मन।

Comments

9 responses to “विपरीत”

  1. MS Lohaghat

    सुख की जगह सूख होना चाहिए, बाकी सुन्दर विपरीतार्थक बन रहा है

    1. Satish Pandey

      भरी दोपहरी की धूप में
      जिस तरह सूखने की बजाय
      गीला हो जाता है पसीने से
      बदन,
      ठीक उसी तरह
      भरी बरसात में
      हरा-भरा न होकर
      सूख गया है मन।

      1. सही कहा आपने

  2. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    विरोधाभास का सुंदर प्रयोग

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  3. सूख।
    बाकी सब कुछ बेहतरीन है

    1. Satish Pandey

      👏

      1. Abhishek kumar

        👍

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