आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
पलकें बंद कर देखूं तो सब
क्यों लगता है सपना सा।
बाहें किरणों की पसरा कर वह
देख मुझे मुस्काता है।
बस वही सिर्फ एक सितारा
हर रोज मुझे क्यों भाता है।
आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
बादल की चादर के पीछे जब
वह छिप जाता है।
बिछड़ा हो बच्चा माँ से जैसे
इस तरह तडपाता है।
आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
पलकें बंद कर देखूं तो सब
क्यों लगता है सपना सा। ….
– पूनम अग्रवाल
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