वो खिड़कियाँ

तुम्हारी चादर में लिपटे
कुछ शक के दाग थे।

तुम मेरी मंज़िल और
तुम्ही हमराज थे।

क्या थे दिन और
क्या लम्हात थे।

कुछ अंजाम और
कुछ आगाज़ थे।

इल्जाम लगा किस्मत और हालात पर हम तो, बचपन से ही बर्बाद थे।

सुबह हुई तो देखा
तकिये पर पड़े सूखे,
अश्कों के दाग थे।

वो खिड़कियाँ अब
बन्द ही रहती हैं ,

जिनके दीदार के कभी
हम मोहताज़ थे।

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