वो डरावना-सा बचपन

सब चाहते हैं,
फिर से वो बचपन पाना,
शरारत से भरी ऑंखें,
और मुस्कुराना,
पर मैं नही चाहती,
वो बचपन पाना,
डर लगता है,
उस बचपन से,
घूरती आँखों,
और उन हैवानों से,
अब है हिम्मत,
हैं डर को जितने का दम,
तब नहीं था, वो मेरे भीतर,
डरती थी, सहमती थी,
बंद कमरे में , सिसकती थी,
चाहती थी, खुलकर हंस सकूँ,
पर न कुछ कह पाना न समझ पाना,
रोना याद कर उन लम्हों को,
और खुद को सजा देना,
मैं नही चाहती वो बचपन पाना,
जहाँ छिनी जाती थी,
पल पल मेरी खुशियां,
जोड़ती थी साहस, की खुद को है,
बचाना,
बचाया खुद को मैंने,
कभी वक़्त ने साथ दिया, कभी दूरियों ने,
कभी अपनों ने, कभी परायो ने,
कोमल मन पर , वो डर का साया,
मैं नही चाहती वो बचपन दोहराना।।।।

Comments

16 responses to “वो डरावना-सा बचपन”

  1. मासूम बचपन की संजीदा रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Priya Choudhary

    बेहद भावपूर्ण और विचारणीय कविता👍👍

    1. बहुत बहुत धन्यवाद।

  3. Prayag Dharmani

    भावपूर्ण रचना

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

  5. Praduman Amit

    आपकी कविता नारी की प्रतिमा को जीवंत चित्रण करती है प्रतिमा जी।

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद

  6. Pratima chaudhary

    Thank you sir

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