जिन्दगी की सरगम पर
गीत क्या मैं गाऊँ
तुम्ही अब बता दो
वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
पतझङ सी वीरानी
छायी है जीवन में
ना कोई है ठिकाना
खुशी अटकी है अधर में
दो राहे पर खङी मैं
किस पथ पर मैं जाऊँ
तुम्हीं अब बता दो
वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
नज़र में जो छवि थी
कभी राधा मैं बनीं थीं
कान्हा की लगन मन में लगी थी
उसकी हंसी भी वैरन सी खङी थीं
विश्वास की डोर टूटी
दुनिया ही जैसे लूटी
झूठ के भँवर से कैसे निकल पाऊँ
तुम्हीं अब बता दो
वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
वो प्रीत कहाँ से लाऊं
Comments
11 responses to “वो प्रीत कहाँ से लाऊं”
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“झूठ के भँवर से कैसे निकल पाऊँ
तुम्हीं अब बता दो
वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।”
उच्चस्तरीय पंक्तियाँ, उम्दा कवित्व, लाजवाब कविता।-

बहुत बहुत धन्यवाद
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very nice
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद धन्यवाद
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Nice lines
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Very good
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बहुत बहुत धन्यवाद
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जिन्दगी की सरगम पर
गीत क्या मैं गाऊँ
तुम्ही अब बता दो
वो प्रीत कहाँ से लाऊँ।
पतझङ सी वीरानी
छायी है जीवन मेंउत्तम लेखन व भाव प्रगढ़ता के साथ उम्दा शिल्प
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