शिकायतें

आना मिलने बादलों के पार,
शिकायतों का पुलिंदा भरा है
दिल में मेरे।

पिछले और उससे भी पिछले
कई जन्मों में
जो तुमने कुछ दर्द दिए थे!
और मेरे आंसू निकल पड़े थे।
उन सब का हिसाब करना है
तुमसे।
मेरे साथ चलते चलते
पीछे मुड़ मुड़ कर
खूबसूरत बालाओं को
जो तुम
चोरी चोरी देखा करते थे
और मेरे दिल में एक कसक सी उठती थी।
उन सब का हिसाब भी तो करना है
तुमसे मुझे।

मेरे कुछ लम्हे कुछ खत
जो मैंने खर्च किए थे तुम पर!
वह लम्हे ब्याज समेत
तुम्हे वापस देने होंगे
मुझे
और अब इस जन्म में
तुम्हें सिर्फ मेरा ही बनकर रहना हो
समझे तुम!
निमिषा सिंघल

Comments

8 responses to “शिकायतें”

  1. Panna Avatar

    आपकी कविता पढ्कर गुलजार साहब का ‘मेरा कुछ सामान’ गीत याद आ गया..बहुत खूब

    1. अतिसुन्दर

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