संभालो रिश्तों की डोर

क्यूं बदल गया परिवेश,
बदल गए रिश्ते,
आधुनिकीकरण के दौर में,
फरेबी हो गए रिश्ते,
झूठी आन बान शान,
पैसे की ताकत पर झुकते रिश्ते,
इसकी अंधी चाहत ने,
खोखले कर दिए रिश्ते,
एक समय कभी था ऐसा,
रिश्ते एकता के सूत्र में पिरोए रहते थे,
आदर स्नेह भाव मन में रहता,
दुख दर्द आपस में बंटते थे,
प्रेम ,सौहार्द भावना खत्म हुई,
रिश्तो से कर लिया किनारा है,
एकाकीपन में गुजरे जीवन,
फीका लगता जग सारा है,
कहीं थम न जाए सांसो की डोर, बचा लो तुम रिश्ते,
मिटाओ मन में छुपा जो बैर,
संभालो तुम रिश्ते।
–✍️ अमिता गुप्ता

Comments

4 responses to “संभालो रिश्तों की डोर”

  1. Praduman Amit

    कभी कभी वक्त भी दिल पर भारी पर जाता है।

  2. शानदार प्रस्तुति

  3. Satish Chandra Pandey

    अति उत्तम सृजन अमिता जी

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