हम उस मुकाम पर है
जहाँ जिम्मेदारियां
सर चढ़ बोलती हैं
काम के बोझ तले दबी जिन्दगी,
नयी चीजों को
सीखने की प्रवृत्ति उदासीन होती है
पर मेरी उत्कंठा
नित नयी चीजों को सीखने की
जानने की- तृष्णा जगाती है
कुछ अधूरे ख्वाब को
पुनः उङान देने को तत्पर रहतीं हैं
बचत से ज्यादा
ध्यान इस पर केन्द्रित रहता है
हर एक क्षण का
सदुपयोग कैसे करूँ
कैसे कुछ नया ज्ञान अर्जित करूँ
कुछ नया नये रूप में सृजित करूँ
फिक्र में दिन-रात
बेचैनी का आलम रहता है
किसी भी पल का व्यर्थ जाना
सच कहूँ-
बङा खटकता है ।
सच कहूँ
Comments
2 responses to “सच कहूँ”
-
अति सुंदर भाव
-
वाह
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