सफलता ,ऊँची उड़ान

कविता : सफलता ,ऊँची उड़ान
जीवन है छणिक तुम्हारा
भूल कभी कोई न जाना
बनकर सूरज इस वसुधा का
जर्रे जर्रे को चमकानां ||
सूरज ,चांद सितारे छुपते
हम ,तुमने भी है एक दिन जाना
नाम रहे जो जग में रोशन
ऐसा कुछ करके दिखलाना
बनकर गुल इस वसुधा का
जर्रे जर्रे को दमकाना ||
जैसा चाहते हो औरों से
वैसा ही करके दिखलाना
गर प्रकाश में चाहो रहना
प्रकाश बन कर जग में है छाना
बनकर खुशियां इस वसुधा की
जर्रे जर्रे को हर्षाना ||
किस ओर है मंजिल ,किस ओर जाना
अनदेखी राहें भटक तुम न जाना
संजोए हैं जो सपने ,जीवन में अपने
पूरा उन्हें करके है दिखाना
बनकर पुष्प इस वसुधा का
जर्रे जर्रे को महकाना ||
‘प्रभात ‘ समय और पानी की धारा
दोनों कभी न रुक सकते हैं
वे ही सिर धुन धुन रोते हैं
जिनके साथ न वे चलते हैं
हिम्मत और लगन से डरकर
आफत सदैव छिपती है
हो निडर आगे बढ़ो तुम
सुखद सपनों मे न फूलो
हर व्यथा की घूंट पीकर
कठिनाइयों के बीच झूलो
हिम्मत का पतवार पकड़ लो
फिर तुम अपनी नाव चलाओ
फिर सफलता मिलकर रहेगी
नियति भी तुमसे थर्राकर
आनंद की वर्षा करेगी ||

Comments

4 responses to “सफलता ,ऊँची उड़ान”

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  2. सुंदर शिल्प के साथ ही आपने कविता की शब्दावली को भी बेहतर बनाया है

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना, सुंदर शब्दावली

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