सब धर्म समान

अपना तो एक धर्म है, पर सबका सम्मान
करने में सुख निहित है, ईश्वर एक समान
ईश्वर एक समान, छोटा बड़ा न कहिए
संविधान निरपेक्ष, सदा मर्यादा रहिए
कह पाठक कविराय, रहा बापू का सपना
अनेकता में एक भाव दे भारत अपना

Comments

2 responses to “सब धर्म समान”

  1. अनेकता में एकता का पाठ पढ़ाते बहुत ही सुंदर रचना

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