बहुत ही कोशिश की,जरा हम भी बदले से जाएँ
पर कैसे अब तक यह मन, बात समझ न पाए ।
अपनों से दर्द मिले थे अकसर
शिकवा-शिकायत चलता ज्यादा- कमतर
अनजान भी कैसे चोट पहुँचाए, मन समझ न पाए ।
ना कोई रिश्ता, शत्रुता की ठौर कहाँ
बिन समझे ही, कैसा शोर यहाँ
सब एक हैं, काहे को पछताए, मन समझ न पाए ।
चन्द दिवस का साथ है अपना
यहाँ कहाँ हमको, इतिहास है रचना
बिन समझे ही क्यू बैर बढाय, मन समझ न पाए ।
दोष कयी मुझमें भी है, पर अनजाने में भूल गयी मैं
मिथ्या आरोप से आरोपित, गरिमा पद की विसर गयी मैं
खुद से खुद को कैसे वेधित कर, मन समझ न पाए ।
समझ न पाए
Comments
6 responses to “समझ न पाए”
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सुंदर
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बहुत सुंदर
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सादर आभार
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सादर आभार
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Nice
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बहुत बहुत धन्यवाद
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