सरहद

सौ दफा मैं हारा बेशक
जिद है फिर भी जीत की
सरहद नहीं होती कोई
परिंदों और प्रीत की।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

7 responses to “सरहद”

  1. Suman Kumari

    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. प्रेरक रचना

    2. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      धन्यवाद

    3. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

  2. कहा गया है;
    गिरते हैं घुड़सवार ही मैदाने जंग में’
    जो कदम बढ़ायेगा वह गिरेगा और आगे भी बढ़ेगा
    सच ही कहा आपने परंदों और प्रीत की कोई सरहद नहीं होती
    वो तो हर सीमा को पार कर जाते हैं

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      अभिव्यक्ति पर खूबसूरत समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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