सर्द रातें

ठिठुरती रातों में वो हवाएँ जो सर्द सहता है।
किसे बताएँ मुफ़्लिसी का जो दर्द सहता है।

ज़मीं बिछा आसमां ओढ़ता, पर सर्द रातों में,
तलाशता फटी चादर, जिसपे कर्द रहता है।

पाँव सिकोड़, बचने की कोशिशें लाख की,
पर बच ना सका, हवाएँ जो बेदर्द बहता है।

किसको इनकी परवाह, कौन इनकी सुनता,
देख गुज़र जाते, कौन इन्हें हमदर्द कहता है।

रोने वाला भी कोई नहीं, इनकी मय्यत पर,
खौफनाक शबे-मंज़र, बदन ज़र्द कहता है।

देवेश साखरे ‘देव’

मुफ़्लिसी- गरीबी, कर्द- पैबंद,
शबे-मंज़र- रात का दृश्य, ज़र्द- पीला

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

+

New Report

Close