सलीका

ना तन्हाई की समझ है ना काफिले में चलने का सलीका मुझे,

मगर ठहरकर कभी मन्ज़िल मिलती नहीं,
सो अक्सर राहों पर बढ़ता रहता हूँ मैं,

ना चुप्पी की समझ है ना शोरो गुल में बैठने का सलीका मुझे,

मगर जादा बोलने से शब्दों का प्रभाव नहीं रहता,

सो अक्सर खामोशी से खुद को बयाँ करता रहता हूँ मैं,

ना डूबने की समझ है ना तैरने का सलीका मुझे,

मगर डूब जाती हैं समन्दर में काठ की कश्तियाँ भी देखा है,

सो अक्सर हुनर ऐ तैराकी सीखता रहता हूँ मैं॥

राही (अंजाना)

Comments

2 responses to “सलीका”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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