सावन की लगन…

ऐसी लागी लगन
सावन की मुझे,
मैं तो घड़ी-घड़ी कविता
बनाने लगी..
कभी सोते हुए
कभी जगते हुए,
बेखयाली में कुछ
गुनगुनाने लगी..
गजलों में मगन,
नज्म़ों में मगन,
कल्पनाओं में दुनियां
बसाने लगी..
छोंड़ा मैंने उसे
प्यार करती थी जिसे,
सावन को मोहब्बत
जताने लगी..
ओ कवियों! मुझे
उन्माद तो नहीं,
बेवजह आज कल
मुस्कुराने लगी..

Comments

12 responses to “सावन की लगन…”

  1. Satish Pandey

    यूँ ही उत्साह में रह वो उगते हुए कवि
    कल तुझे सारा जहान रोशन करना है।
    बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ सृजित की हैं प्रज्ञा जी। जय हो, लेखनी यूँ ही निखरती रहे।

    1. आप सबके लिए ही है

  2. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  3. Geeta kumari

    वाह, प्रज्ञा बहुत सुंदर

  4. Very nice😊😊😊😊👏👍

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह वाह क्या बात है!!!!!

    1. आपका धन्यवाद

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सावन मंच के प्रति बेहद प्रेम को प्रकट करती ,बहुत सुंदर पंक्तियां
    बहुत अच्छे प्रज्ञा जी यहां पर लगभग सभी सदस्यों का यही हाल है, बहुत लगाव हो गया है सावन से ,जो यहां पर आता है इसी का हो जाता है।

    1. आपका धन्यवाद सही कहा

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