साहित्य है सबके लिए,
यही समाज का है दर्शन।
रुचिकर भी हो पढ़ने में,
हो उस काल का दर्पण।
जीवन की समस्याओं पर भी करे विचार,
ऐसा हो साहित्यकार।
कठिनाइयों पर विजय पाने की,
नैराश्य में आशा लाने की
जो कवि ज्योति जगाता है,
वही सच्चा कवि और साहित्यकार कहलाता है।
सूरज का उगना,डूबना
उषा और संध्या की लाली,
सुन्दर सुगन्धित चलती पवन
और कभी फलों की झुकी डाली।
प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन,
जब कोई कवि निज कलम से करता है,
प्रतिदिन आने वाली चिड़िया की भी,
वह मीठी बोली सुनता है।
कल-कल करती नदी बहती
झर-झर झरने बहते हैं
नाचता हुआ मयूर है दिखता,
इसे ही सौंदर्य कहते हैं।
समाज की समस्याओं की ओर,
जब साहित्यकार ध्यान दिलाता है
अवसाद निराशा में डूबा मानव भी
आशा की किरण को पाता है।
यही है साहित्य का काम,
इसलिए कवि कलम को ना दो आराम
काली घटाएं ठंडी हवाएं,
साहित्य की यही जान हैं
मौसम और माहौल से परिचित करवाना,
यही साहित्य की पहचान है॥
_______गीता कुमारी
साहित्य है सबके लिए
Comments
6 responses to “साहित्य है सबके लिए”
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बहुत सुंदर कविता, अति उत्तम भाव, अति उत्तम शिल्प
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सुंदर और उत्साहवर्धक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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Thanks a lot Vivek bhai
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अतिसुंदर
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सादर आभार भाई जी🙏
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