सुबह सुबह सूरज की किरणें
लगती हैं कितनी मनभावन,
नई लालिमा युक्त चमक है,
लगती हैं निखरी सी पावन।
खुश होकर चिड़िया बोली है
उठो सखी सुबह हो ली है,
एक झाँकती है बाहर को
दूजी ने आँखें खोली हैं।
छोटे-छोटे पौधों भी तो
देख रहे गर्दन ऊँची कर
आओ पास आ जाओ किरणों
बोल रहे हैं उचक उचक कर।
सूरजमुखी उस ओर मुड़ रही
बन्द कली इस वक्त खिल रही,
ओस बून्द को आत्मसात कर
किरणें धरती के गले मिल रहीं।
सुबह सुबह सूरज की किरणें
Comments
5 responses to “सुबह सुबह सूरज की किरणें”
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प्रकृति का खूबसूरत चित्रण
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सुबह की खूबसूरती का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया है कवि सतीश पाण्डेय जी ने अपनी इस कविता में, लाजवाब अभिव्यक्ति
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Very nice
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सुबह सुबह सूरज की किरणें
लगती हैं कितनी मनभावन,
नई लालिमा युक्त चमक है,
लगती हैं निखरी सी पावन।
खुश होकर चिड़िया बोली है
_________ प्रातः काल की बेला के सौन्दर्य का अद्भुत वर्णन प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की अत्यंत शानदार और अनुपम रचना, बहुत सुंदर शिल्प के साथ अति उत्तम लेखन -

बहुत अच्छी कविता
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