प्रिय स्त्री,
तुम्हारा प्रेम हमेशा कोमल क्यों है?
क्यों नहीं तुम भी दुनिया के
तर्कों और व्यावहारिकता की चाशनी में
प्रेम को डूबा कर कठोर बना पाई?
वो मीठास तो फिर भी रहती ही न,
प्रेम तो प्रेम ही रहता?
पर सच है, कोमलता चली जाती।
वो इंतजार की सुगंध,
वो तत्परता का अंश भी चला जाता।
फिर तुम्हारा प्रेम भी तर्क और व्यंगों के हाथों,
निर्दयी, कठोर पंजों में पकड़ कर,
घोट देता स्नेह, भावुकता और जुड़ाव का गला।
फिर तो अंतर ही नहीं रह जाता,
स्त्री और पुरुष के प्रेम में।
अच्छा तभी मैं समझी,
तुमने क्यों संजो कर रखा है,
अपना कोमल प्रेम।
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