हम क्यूं न समझ पाते हैं

ख्वाब जो देखें हैं
उनका टूटना बिखरना
बहन के लिए मुश्किल है
भाई की शिकायत सुनना
भाई कहां गलतियों से
बाज कभी आते हैं

जो आशाएं रखी है
अपनी बहन बेटी से
वो सम्मान औरों को
क्यूं दे नहीं पाते हैं
हम स्वयं की ही चिंता में
कितने निष्ठुर हो जाते हैं

सौ दोस्त थे उनके
सौ काम बनाया था
कद ऊंट सा था लेकिन
बच्चे ही थे अभी शायद
गलतियां बच्चों से होती
हम क्यूं न समझ पाते हैं

जिन्होंने सजा दी है
फ़रिश्ते वो होंगे शायद
इन बच्चों के जैसे
उनके बच्चे न होंगे शायद
इतनी निष्ठुरता धारण कर
कैसे बड़े कहलाते है

उस मां पे क्या बीती
संतान जिसका विक्षत हो
उस बहन की हालत क्या
सपना जिसका टूटा हो
औरों के दर्द न पीते हैं
कैसे इंसान कहलाते है

गलतियां हर इंसान से
हर रोज ही होती है
सुधार करते हुए जिंदगी
आगे को बढ़ती है
दूसरों को सजा देने वाले
यूं भगवान कैसे बनते हैं

Comments

2 responses to “हम क्यूं न समझ पाते हैं”

  1. Praduman Amit

    अति सुंदर

  2. वाह क्या बात है 

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