अम्बर झुका हुआ है
और वसुंधरा है बसंती
कोपल की तरह प्रस्फुटित हो रहा है मन
हर शाख पर खिल रहा है
सुमन ।
हर पत्ता बूटा भीगा है लतपत है
उपवन
वृन्त से पृथक हो
झूमता है मन-गगन
प्राणवायु भर रही है
लहरों की छुअन
गीत क्षुभ्ध हैं और
हरित है वसन
हरित है वसन
Comments
12 responses to “हरित है वसन”
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Nice
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धन्यवाद
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Nyc
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थैंक्स
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Good
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थैंक्स
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नाइस वर्ड
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धन्यवाद
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वाह
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थैंक्स
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Nice poem
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धन्यवाद
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