हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया
हाय रे ! कितनी लोभी…
अपनी इज्जत बाजारू कर
घर की चलती रोटी…
हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया
हाय रे ! कितनी लोभी….
बेंचकर अपने बाप का कफन
खाते हैं देखो रोटी…
हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया
हाय रे ! कितनी लोभी…
बच्चे को अपनी ओट बनाकर
मांगे दर-दर रोटी…
हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया
हाय रे ! कितनी लोभी….
रिश्ते अब तो काँच से नाजुक
जान से मंहगी रोटी…
हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया
हाय रे ! कितनी लोभी….
“हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया”
Comments
2 responses to ““हाय रे ! कितनी लोभी दुनिया””
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अतिसुंदर भाव
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धन्यवाद
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