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  1. ….हिरण सा मन बना लूँ
    दिखे चंचल सा बाहर
    मगर भीतर कलेजा
    शेर का अब लगा लूँ।
    ……..लिखूं वो सब मुझे जो
    ले चले प्रेम पथ पर,
    मिटा दूँ सब गलत वह
    उगे जो द्वेष पथ पर।
    ………….. कवि सतीश जी की अत्यंत सुंदर रचना । शिल्प और भाव का सौंदर्य अनुपम है । समाज को बहुत सुंदर साहित्य परोसते हुए एक अद्भुत काव्य रचना

  2. जुबान से मेरी
    किसी का दिल न दुखे
    न कभी लेखनी यह,
    ठेस के भाव लिखे।
    न निशाना हो मेरा
    कहीं पर व्यक्तिगत सा
    न कोई बात बोलूं
    दिखूँ जो व्यक्तिगत सा।

    Nice line

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