8 Comments

  1. ख़्वाब देखते हैं सुहाने अपने मन से
    किसी से कुछ भी कहां मांगते हैं
    पत्थर को तोड़ कर कंकर बना दे
    हम ऐसा भी हुनर जानते हैं।
    —— बहुत सुन्दर रचना, आपकी काव्य प्रतिभा अद्भुत है। भाव और शिल्प का बेहतरीन तालमेल है।

  2. प्रेरणा देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी, सुंदर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत आभार सर

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