ज़िन्दगी की किताब

अभी ज़िन्दगी की किताब के चन्द पन्नों को पटल कर देखा है।
अपने बचपन को जैसे सरसरी निगाहों से गुजरते देखा है,
यूँ तो खुशियों के पायदान के पृष्ठ पर आज पैर हैं हमारे,
मगर हमने भी दुखों के हाशियों पर खड़े रहकर देखा है॥
राही (अंजाना)

Comments

2 responses to “ज़िन्दगी की किताब”

  1. Abhishek kumar

    Good

  2. Pratima chaudhary

    Nice lines

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