ज़िन्दगी की किताब

 

अभी ज़िन्दगी की किताब के चन्द पन्नों को पटल कर देखा है।
अपने बचपन को जैसे सरसरी निगाहों से गुजरते देखा है,
यूँ तो खुशियों के पायदान के पृष्ठ पर आज पैर हैं हमारे,
मगर हमने भी दुखों के हाशियों पर खड़े रहकर देखा है॥
– राही (अंजाना)

Comments

4 responses to “ज़िन्दगी की किताब”

  1. Panna Avatar

    bahut hi khoobsurat Shakun ji

    देखा है दुनिया को अपनी दिशा बदलते
    अपने लोगो को अपनो से आंखे फ़ेरते
    कतरा कतरा जिंदगी का रेत फिसलता जाता है
    देखा है जिंदगी को मौत में बदलते

  2. Abhishek kumar

    Very good

  3. Pratima chaudhary

    बेहतरीन प्रस्तुति

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