ज़िन्दगी

ज़िन्दगी के कुछ पल बदलना चाहता हू
काश रोक लिया होता तुम्हे
तोह हालत कुछ और होते

मुहब्बत तुम्हारे सपनो के आगे बहुत छोटी थी
इसलिए तुम्हे जाने दिया
तुम्हे मुझे गलत समझने का कारण दिया

जब आपने सपनो को पा लोगी
लौट कर देखोगी तोह मुझे ना पाओगी
मैंने भी मिडिल क्लास लोगों की तरह अपना घर सज़ा लिया है

Comments

13 responses to “ज़िन्दगी”

  1. Pratima chaudhary

    Very nice lines

  2. Satish Pandey

    भावपूर्ण कविता है, उनके चले जाने का गम भी है, जाने का कारण भी है, कारण यह है कि उनके सपने बहुत बड़े थे, मुहब्बत से भी बड़े सपने थे, इसलिए मुहब्ब्त छोड़कर सपने पूरे करने चल दिये। श्रृंगार के वियोग पक्ष की अनुभूति कराती सुन्दर कविता।

    1. Antariksha Saha Avatar

      Mere kavita ka etna acha vislesan kabhi kisi ne nahin kiya

      1. Satish Pandey

        सर मैंने, आपकी कई पुरानी कविताएं भी पढ़ी हैं। आप बहुत ही शांत तरीके से मन की भावनाओं को कविता का रूप देते हैं। जिससे मन प्रभावित है। आप काफी समय पूर्व से इस मंच में लिख रहे हैं। आपके प्रति मेरे मन में सहज ही स्नेह की परिव्याप्ति है। आपका साहित्यिक प्रेम सैल्यूट के काबिल है। सादर नमस्कार

  3. Geeta kumari

    विरह वेदना का यथार्थ चित्रण

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत सुंदर पंक्तियां

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