ღღ_कर तो लूँ मैं इन्तजार, मगर कब तक;
लौट आएगा बार-बार, मगर कब तक!
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उसे चाहने वालों की, कमी नहीं है दुनिया में;
याद आएगा मेरा प्यार, मगर कब तक!
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प्यार वो जिस्म से करता है, रूह से नहीं;
बिछड़कर रहेगा बे-क़रार, मगर कब तक!
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दर्द अहसास ही तो है, मर भी सकता है;
बहेंगे आँखों से आबशार, मगर कब तक!
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कहीं फिर से मोहब्बत, कर ना बैठे ‘अक्स’;
दिल पे रखता हूँ इख्तियार, मगर कब तक!!…..#अक्स
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मगर कब तक!

Comments
14 responses to “मगर कब तक!”
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Beshumaar pyar kiya hamne har lamha unhe
Nafrat se Gujarat hoga, magar kab tak-

lajwab manohar ji…..shukriya 🙂
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bahut sundar ji 🙂
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thank uuu Niranjan ji……
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nice
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shukriya Virendra ji….
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बहुत खूब
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shukriya Panna sahab…….
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nice
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thank uuu Sridhar ji…….
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behatreen ghazal sir
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shukriya Neelam ji….._/\_
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Good
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वाह बहुत सुंदर
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