Ankit Bhadouria, Author at Saavan's Posts

कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक; तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक! . तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ; ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक! . कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ; शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक! . प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे; तु... »

“ना पा सका “

“ना पा सका “

ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका; इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका! . जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के; मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका! . मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या; जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा! . साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा; अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा! . मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है; जो आईना गवाह था, वो आईना तो त... »

Kal Tak To Saara Desh Khada Tha

Kal Tak To Saara Desh Khada Tha

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“मैं कौन हूँ”

“मैं कौन हूँ”

ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है; कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है! . किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल; जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है! . मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ; जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है! . वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी; पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है! . इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है; कोई जो मु... »

“महबूब”

“महबूब”

शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार; आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है! . इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब; पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है! . मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी; ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है! . बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब; जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है! . जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना; मेरे महबूब के चेहरे से, ... »

“मुलाकात रहने दो”

“मुलाकात रहने दो”

ღღ_आज ना ही आओ मिलने, ये मुलाकात रहने दो; कुछ देर को मुझको, आज मेरे ही साथ रहने दो! . अन्धेरों की, उजालों की, हवाओं की, चिरागों की; या अपनी ही कोई बात छेड़ो, मेरी बात रहने दो! . मैं सोया कि नहीं सोया, मैं रोया कि नहीं रोया; और भी काम हैं तुमको, ये तहकीकात रहने दो! . यूँ तो सैकड़ों रात जागा हूँ, तुम्हारे ही ख्यालों में; पर सोना चाहता हूँ अब, आज की रात रहने दो! . जाते-जाते ‘अक्स’, मेरा इक मशविरा है तु... »

Miscellenious

Miscellenious

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“देखा नहीं तुमने”

“देखा नहीं तुमने”

ღღ_ख़ुद से लेते हुए इन्तक़ाम, देखा नहीं तुमने; अच्छा हुआ मेरा अस्क़ाम, देखा नहीं तुमने! . उतर ही जाता चेहरा मेरा, शर्म से उसी दम; अच्छा हुआ मेरा अन्जाम, देखा नहीं तुमने! . कल रात को हर ख़्वाब से, लड़ गया था मैं; अच्छा हुआ मेरा इत्माम, देखा नहीं तुमने! . रोया था मैं ही चीखकर, ख़्वाबों की मौत पे; अच्छा हुआ ये ग़म तमाम, देखा नहीं तुमने! . सुबह तक पड़े रहे, टुकड़े ख्वाबों की लाश के; अच्छा हुआ मुझे नाकाम, देखा ... »

“ग़ज़ल होती है”

“ग़ज़ल होती है”

ღღ_महबूब से मिलने की, हर तारीख़ ग़ज़ल होती है; महफ़िल में उनके हुस्न की, तारीफ़ ग़ज़ल होती है! . ग़ज़ल होती है महबूब की, बोली हुई हर बात; आशिक के हर ख्वाब की, तकदीर ग़ज़ल होती है! . गर आज़माओ तो ज़ंजीर से, मज़बूत है ग़ज़ल; तोड़ना हो तो विश्वास से, बारीक़ ग़ज़ल होती है! . आशिक़ के दिल की आह भी, होती है इक ग़ज़ल; कहते हैं कि मोहब्बत की, तासीर ग़ज़ल होती है! . ‘अक्स’, कलमकार की कलम का, तावीज़ है ग़ज़ल; अग़र नाम हो जाये, तो हर ना... »

“ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

“ग़ज़ल लिक्खूँगा!”

ღღ_मैं भी लिक्खूँगा किसी रोज़, दास्तान अपनी; मैं भी किसी रोज़, तुझपे इक ग़ज़ल लिक्खूँगा! . लिक्खूँगा कोई शख्स, तो परियों-सा लिक्खूँगा; ग़र गुलों का ज़िक्र आया तो, कमल लिक्खूँगा! . बात ग़र इश्क़ की होगी, तो बे-इन्तहा है तू; ज़िक्र ग़र तारीख का होगा, तो अज़ल लिक्खूँगा! . मैं लिक्खूँगा तेरी रातों की, मासूम-सी नींद; और अपनी बेचैन करवटों की, नक़ल लिक्खूँगा! . हाँ ज़रा मुश्किल है, तुझे लफ़्ज़ों में बयां करना; फिर भी य... »

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