गजल

2122 1212 22

कुछ दिनों से खफा-खफा सा है ।

चाँद मेरा छुपा-छुपा सा है ।।

 

कुछ तो जिन्दा है जिस्म के अंदर ;

और कुछ तो जुदा-जुदा सा है ।

 

जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में  ;

होश तब से हवा-हवा सा है ।

 

सादगी से बदल गयी रंगत  ;

ये असर भी नया-नया सा है ।

 

उसकी’ सांसों ने’ छू लिया था कल ;

जिस्म से रूह तक छुआ सा है ।

 

उसने’ भी आग को हवा दी थी ;

हर तरफ जो धुँआ-धुँआ सा है ।

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’

Comments

10 responses to “गजल”

  1. Anjali Gupta Avatar
    Anjali Gupta

    nice 🙂

    1. राहुल द्विवेदी स्मित Avatar
      राहुल द्विवेदी स्मित

      thanks anjali….

  2. Pankaj Soni Avatar
    Pankaj Soni

    अति सुंदर…..भाई

  3. Panna Avatar
    Panna

    bahut khoob!

  4. Vikas Bhanti Avatar
    Vikas Bhanti

    राहुल भाई इस 2 लाइन्स में गज़ब का जादू है
    जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में ;
    होश तब से हवा-हवा सा है ।

    मज़ा आ गया |

  5. Kapil Singh Avatar
    Kapil Singh

    क्या कहे क्या खूब कहा आपने
    रूह का रोम रोम छुआ सा है

  6. राम नरेशपुरवाला

    Good

  7. Satish Pandey

    जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में ;

    होश तब से हवा-हवा सा है ।
    बहुत ही जबरदस्त, वाह

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