कुछ खास नहीं था कहना ,
कुछ बात नहीं था कहना ,
जो बोल न पाया ख्यालों की अंजुमन मैं ,
बिन बोले तुम तक वह बात पहुंच गयी ,
आस्चर्य मैं पढ़ जाता हूँ मैं ,
मेरे दिन की रहमत होगी जरूर तुम ,
नहीं तोह तुम तक मेरी हर अनकही बात कैसे पहुंच जाती हैं
माँ
Comments
8 responses to “माँ”
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nice
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Behad umda kavita
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एक शब्द जिसमें , ख़ुदा का हर राज़ छुपा हैं ….
वो हैं …
\” माँ \”….. -

waah..! well said.. 🙂
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emotional…
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Touching lines
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touched my heart
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Waah waah
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