किसान

किसान

हाँ मैं ही हूँ किसान साहब
जो खोतो में काम करता हैं
बैल को भाई मानता
खेत को धरती माता
हल को पालन हार मानता
जीवन को खेत में निकाल देता
शहर से कोशो दुर हूँ मैं
खेत में मैं लीन हूँ
आपके जैसी शान नहीं हैं मेरी
फिर भी तुम कर्जदार हो मेरे

चुभन होती हैं साहब मुझको भी
जब कोई मजदूर बोलता हैं
मजदूर नहीं हूँ मैं किसान हूँ
देश का प्रधान सेवक हूँ
मुझे नहीं आती चापलुसी
नहीं मिलती खबर अखबार की
खेतो में लगा रहता हूँ
इसीलिए अनपढ़ गँवार हूँ
मैं सेवक हूँ अन्नदाता हूँ
फिर भी मेरा कोई पहचान नहीं

महेश गुप्ता जौनपुरी

Comments

One response to “किसान”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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