Tag: मजदूर पर हिंदी कविता

  • मजदूर हूं साहब

    मैं मजदूर हूं साहब यह सौभाग्य है मेरा,
    देश के लिए करना मजदूरी काम है मेरा।
    करते करते मजदूरी देश को समृध्द बनाऊंगा,
    आन बान शान का लाज रखना काम है मेरा।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • राष्ट्र निर्माता

    मजदूर ही राष्ट्र का निर्माता,
    इनको हम क्यों भूल गये ।
    चन्द रूपये पाकर हम,
    इनको हम क्यो अलग किये।।

  • मेरे दोस्त मजदूर

    हमें गर्व है तुम पर,
    मेरे मित्र मजदूर ।
    किस्मत को मत कोसों,
    हम है बहुत मजबूर।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • लाल

    बहुत आहत हुआ हूं देख तुम्हरा हाल,
    एक मशाल जलाऊंगा बनकर मैं मिशाल।
    मजदूर नहीं मजबूर होगा करूंगा मैं प्रयास,
    मुझ पर भरोसा रखना मैं हूं देश का लाल।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • दो जून की रोटी

    दो जून की रोटी कमाने निकला था ंमजदूर
    घर वापस आया तो दर्द के सिवा कुछ नहीं था ।

  • बड़ा इंसान

    चादर बांट हौसले मुझे नहीं तोड़ना,
    मजदूर भाई मुझे तुम्हारा राह नहीं मोड़ना।
    तुम्हारे हक का हम दे सकें मेहनताना,
    बड़े बनकर तुम्हारा हक मुझे नहीं है छिनना।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मजबूरी

    कभी झांक कर देखना मजदूर के घर,
    मजदूर कितना मजबूर हो गया है ।
    टूट के बिखर कर कितना दुखी हो गया,
    पेट के भूख ने ही ऐंसा हाल बना दिया है।।

    ✍ महेश गुप्ता जौनपुरी

  • दर्द

    मजदूर का दर्द कोई ना जाने
    बस सब बाते करते हैं
    वह खाता है सूखी रोटी
    सब माखौल उड़ाते हैं

  • मजदूर का किस्मत

    इस संसार में ना जाने कितने चेहरे है,
    जिम्मेदारीयों पर बहुत सारे पहरे है।
    मजदूर परेशान क्यो है जान तो लिजिए,
    उसके किस्मत पर ना जाने कितने लहरें है।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • वेदना

    अन्तर्मन की वेदना पढ़ ना सके कोय,
    मजदूर की मजदूरी दे ना सके कोय।
    खून पसीने कौन बहता बैठ कर खाते लोग,
    मजदूर की मेहनत को समझ ना सके कोय।।

  • शान

    शान से जीना शान से मरना
    मजदूर की यही निशानी है।
    एक एक कतरे का हिसाब दे
    मौज में रहना ईमानदारी है।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मजदूर का दर्द

    कविदीप लिखों एक ऐंसा संदेश,
    जो मजदूरों का हक करें अदा ।
    खून पसीने का सही मुल्य मिले,
    आपके लेखनी को पढ़ मजदूर हो फिदा।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मजदूर बेचारा

    मजदूर है जीता शान से,
    देख खुशी तिलमिलाए अमीर।
    मजदूरी करके चैन से सोता खाट पर,
    मखमल का बिस्तर आराम ना दें शरीर को।।

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मजदूर

    कहानी बड़ी सुहानी है,
    मजदूर की बड़ी मेहरबानी है।
    सिना ठोंक डटे है रहता,
    यही तो मजदूर का ईमानदारी है।।

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • अमीर

    महल के बिस्तर चुभते रहते,
    धन दौलत में अमीर जीते मरते।
    मजदूर के जैसे खुदकिस्मत कहा,
    चैन से कभी कहां सोते रहते।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • ओ खुदा!

    बेसुध हो पड़ा है ंमजदूर जमीं पर
    ओ खुदा! थोड़ा तो रहम कर इस पर

  • लिख कवि लिख

    लिख कवि

    लिख कवि लिख
    भावनाओं में बहकर लिख
    खुशीयों में फूदक कर लिख
    दर्द आह महसूस कर लिख
    तन्हाई को साथी बनाकर लिख

    लिख कवि लिख
    अफसर का रौब लिख
    नेता की बेईमानी लिख
    भ्रष्टाचार की परछाई लिख
    दुनिया के चापलूसी को लिख

    लिख कवि लिख
    गरिबों का भूख लिख
    नंगे पांव का छाला लिख
    बेरोजगारों का ताना-बाना लिख
    दिन दुखियों के मन का पीड़ा लिख

    लिख कवि लिख
    अमीरों का निकला पेट लिख
    छल कपट का राजनिति लिख
    मजदूरों का खून पसीना लिख
    अमीरों के धन दौलत की बेचैनी लिख

    लिख कवि लिख
    माथे पर का लकिर लिख
    किस्मत का तकदीर लिख
    होशियार का चालाकी लिख
    मजबूर का वेवसी परछाई लिख

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • सोनू सूद

    बड़े बड़े भामाशाह और उद्योगपति का
    संस्कार को मार दिया कोरोना ने मति
    सोनू सूद नमन है आपके प्रेरणा को
    मजदूर के हातालो को बखूबी समझा

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मेरा देश महान

    एक तरफ मजदूर परेशान दूजी ओर किसान
    फिर सब कहते हैं देखो मेरा देश महान

  • मजदूर

    मजदूरों की समस्याओं को
    सिर्फ एक ही व्यक्ति ने समझा है
    सोनू सूद ने बन फरिश्ता उनको घर पहुंचाया है।

  • जेष्ठ की तपती धूप

    जेष्ठ की तपती धूप में, एक माँ अपने छह महीने के बेटे को अपनी पीठ में बांध कर मजदूरी कर रही थी। बच्चा भूख व गर्मी से तड़प रहा था। वह जोर जोर से चिल्ला रहा था। वहाँ के मुंशी जी का कहना था कि,कोई मजदूर मेरे मौजूदगी में अगर बैठा पाया गया तो ,उसकी उस दिन की हाजरी काट दिया जाएगा। यही सोच कर माँ अपने बच्चे को दूध पिलाने में असमर्थ थी। वह बच्चा रो रो कर व्याकुल था। बच्चे की तड़प और पसीने से भीगी दुखियारी माँ की हालत मुझ से देखी नहीं गयी। मैं उसके करीब जा कर कहा –“कैसी है आप। काम तो होता रहेगा। कम से कम बच्चे को एक मर्तबा दूध तो पिला दीजिए “। माँ –“बेटा। मेरी आज की हाजरी मुंशी जी से कैसे कटवाउं? यदि ऐसा आज हो गया तो मैं अपने बीमार पति के दवा कहाँ से लाऊंगी। वह अस्पताल में दवाई के बगैर आखरी सांसे गिन रहा है”।उस माँ की इतनी बातें सुन कर मेरी आँखें भर आयी। मै उन्हें दस हजार रुपये देते हुए कहा—“माँ जी। यह पैसों से आप अपने पति का इलाज करा ले। ताकि,
    कभी भी आप अपने पति के इलाज के लिए जेष्ठ की तपती धूप में अपने बच्चे को दूध पिलाने मे असमर्थ न हो। ” इतना कह कर वहाँ से मै चल पड़ा। रास्ते में मैं यही सोचता रहा कि, इस माया के संसार में कितने गम है????

  • भोजपुरी गीत- फिर उहे दिनवा |

    भोजपुरी गीत- फिर उहे दिनवा |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    रोवत चिरइया कबों चहकीहे की नाही |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    छाईल बा सगरो कोरोनवा के कहरिया |
    बंद भइले माल सगरो बंद बा बज़रिआ |
    बगिया बहार कली चटकीहे की नाही |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    भागी पराई लोगवा घरवा लुकाईले |
    रोजी रोजगार शहरवा बन हो गईले |
    गोरी गजरा फूल महकिहे की नाही |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    भईले मजबूर मजदूर चले पैदल डहरिया |
    दाना पानी मिले नाही कठिन सफरिया |
    सावन झूला डार लटकिहे की नाही |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    दया करा दईबा भगावा देशवा कोरोनवा |
    दूभर कइलs जान बैरी देश दुशमनवा |
    बरतिया नचनिया नाच मटकिहे की नाही |
    फिर उहे दिनवा लउटिहे की नाही |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • सोचा था जो वो पुरा ना हो सका

    सोचा था जो वो पुरा ना हो सका

    बदलते हालात को देख मैं अपना ना हो सका
    आंखों के आंसूओं को मैं अपने पोंछ ना सका
    टुटते बिखरते देखता रहा मैं कुछ कर ना सका
    सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका

    बदलते काल‌ चक्र में मैं किसी का ना हो सका
    रिस्तें पर दाग लगाकर मैं खुद का ना हो सका
    ख्वाहिशों को मैं अपने रूसवा मैं कर ना सका
    सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका

    अरमानों को मैं ढ़ोता रहा उड़ान दे ना सका
    अपने अन्दर के इच्छाओं को मैं खो ना सका
    आश लगाए बैठा रहा मैं कुछ कर ना सका
    सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका

    महामारी के काल में मैं खामोश रह ना सका
    आवाज़ उठाता रहा लेकिन मैं पलायन रोक ना सका
    मजदूरों का दर्द देखकर मैं सह ना सका
    सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सका

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • लेख

    कर सकें तो मदद करें मजदूर पर राजनिति नहीं

    आये दिन देखने को मिल रहा है सभी राजनीति पार्टियां मजदूरों पर राजनीति करने के लिए सोशल मीडिया पर एंव टीवी चैनलों पर तेजी से जुटे हुए है। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर यह कहां तक सही है राजनीति पार्टीयों का कहना है कि हमारे ध्दारा मजदूरों के हित में तमाम प्रकार की सुविधाओं पर कार्य किया जा रहा है। भूखे को भोजन प्यासे को पानी एवं पैदल मजदूरों के लिए साधन का व्यवस्था किया जा रहा हैं। इसके बावजूद भी मजदूर रोड़ पर बिलख रहे हैं तड़प रहें हैं भूखे पेट व बिना किसी यातायात व्यवस्था के बिना सकैडों किलोमीटर दूर चलने पर मजबूर है। इन सारे विफलताओं के बावजूद भी मजदूरों के ऊपर राजनीति बन्द होने का नाम नहीं ले रहा है। पलायन करना मजबूरों का मजबूरी नहीं बल्कि सरकार के विफलताओं का संदेश है अगर मजदूर को खाने के लिए भोजन मिलता और उनके समस्याओं को ध्यान में रखा जाता तो मजदूर कदापि पलायन का विचार अपने मन में नहीं लाते। लेकिन मजदूर के समस्याओं को गिने चुने नेता ही समझ पा रहें हैं बाकि अन्य नेता इस मौके का फायदा उठाकर अपना राजनीति कैरियर को चमकाने में लगें हैं। शायद उन्हें इस बात की खबर तक नहीं जिन्हें वे वर्षो से बेवकूफ समझते आ रहें हैं अब वे समझदार हो गये है सही गलत के मायने को समझने लगे हैं। मजदूरों के दुःख दर्द को समझते हुए कुछ लोग निस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं भला हो सभ्य समाज एवं एनजीओ का जो मजदूरों को निरन्तर खाने पीने का सामान मजदूरों को हाईवे से लेकर गली मोहल्ले चौराहों तक उपलब्ध करा रहा है। यहां तक एनजीओ भटकते मजदूरों को आराम करने के लिए टेंट व्यवस्था एवं रोगी मजदूरों को दवा मुहैया करा कर उनके आंसुओं को पोंछ रहा है नहीं तो कोरोना के आंकड़ों से ज्यादा भूख से मरने वालों का आंकड़ा होता। तब राजनीति पार्टीयों को अपना मुंह छिपाना पड़ता अगर राजनीति पार्टियां सच में मजदूरों के लिए कुछ करना चाहती है तो उन्हें सड़कों पर चल रहे नंगें पांव मजदूर, भूखे मजदूर,लाचार मजदूर का सहायता करें और उन्हें उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाएं। तभी उनके राजनीति का मकसद पूर्ण होगा टीवी चैनल पर बैठकर डिबेट करने से और भाषण देने से मजदूरों का कभी भला नहीं हो सकता इस बात को राजनिति पार्टीयों को बखूबी समझना चाहिए।

    महेश गुप्ता जौनपुरी
    जौनपुर उत्तर प्रदेश
    मोबाइल – 9918845864

  • अफसर बाबू

    सरकारी बाबू बनकर है बैठे,
    गरिब मजदूर से पैसे हैं ऐंठे ।
    नमक हलाल से बचाये भगवान,
    अफसर के भेष में है दलाल बैठे।।

    ✍ महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मजदूर हू मजबूर नहीं

    मजदूर हू मजबूर नहीं
    तेरे जैसे वीडियो के सामने मदद लेने से इनकार करता हू
    लाखों दूर घर की और सफर करता हूँ बिना किसी मदद के पैदल

    किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया कभी
    कारखाने बंद बाजार बंद
    भूख है की कोई लॉकडाउन नहीं मानती
    पोलिस के डंडे खाकर भी हम कोई काम की आशा में निकलते है

    भीख नहीं मांगते भीख नहीं मांगते
    तुम्हें टिक टॉक और फेसबुक से फुरसत हो
    तोह कभी हमारे लिए सोचना
    बस स्वाभिमान से भरे किसी काम से हो सके तोह जोड़ना

    इस महामारी में मेरे बच्चे भूखे है
    मेरे राशन को चोरी करने से पहले सोचना
    वोट जो मांगते हो उसी की दुहाई देता हूं
    अपने राज धर्म के बारे मे भी तुम थोड़ा देखना

    आपसी रंजिसे भुलाकर साथ तुम चलना
    यह देश रहे तोह हिन्दू मुसलमान का खेल बाद में खेलना
    बात तब्लीक़ की हो या किसी और की
    माहवारी में धर्म को मत जोड़ना

  • गांव याद आये

    “गाँव याद आये”
    **************

    हमें क्या पता आज,ये दिन देखना पड़ेगा |
    न जाने कैसी मजाक,आज तूने किया है ||

    हँसते हुए निकले घर से,भूख मिटाने सभी |
    गाँव घर ये आँगन,छोड़ चार पैसा कमाने ||

    दूर तलक परदेश,सभी हर कोने-कोने गए |
    खेत खलिहान ले याद,बूढ़ी अम्मा की प्यार |

    काम की धुन काम करता,कोई चलता गया |
    मजबूरी मे हमें आज,मजदूरी दूर करना पड़ा ||

    घोर अंधियारा छाए,ये काली रात आज कैसी |
    पसंद न आए तुझे हम,मजदूरों की ये मजबूरी ||

    बच्चे बिलखतेअम्मा,बोझा लिए नंगे पाँव चली |
    बाबुल भूख से कुम्हलाए,जिम्मेदारी लिए हुए ||

    पैरो में छाले पड़े है,डगर आज चलते चलते |
    नीर को तरसे ये,रोटी बिखरे हुए पथ में पड़ी ||

    प्राण गवांते हम पथ में,मंजिल तलाश करते |
    रहम कर परवरदिगार,गाँव अब याद आया है ||

  • मजदूर

    कर दी हैं अब लाल वो राहें
    भारत माँ के वीरों ने
    नाप रहे हैं कदम कदम से
    मीलों दूरी भी तकलीफों से।।

  • बाल मजदूर

    बालश्रम के कलंक को,
    चलो मिटाये मिलकर हम।
    देकर छोटू को विद्या उपहार,
    सारे कसक को मिटाये हम।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • बाल मजदूर

    बच्चें को बचपन तपाना मंजूर था,
    मेहनत मजदूरी की रोटी कुबूल था।
    शान से जीना शान से मरना मां ने सिखाया था,
    इसलिए आत्मसम्मान में रोटी कमाना आसान था।।

    ✍महेश गुप्ता जौनपुरी

  • मज़दूर हूँ

    प्रस्तुत है
    हाइकु विधा में कविता:-

    मजदूर हूँ
    पैदल चल पड़ा
    घर की ओर

    विपदा आयी
    सबने छोड़ दिया
    मौत की ओर

    आशावादी हूँ
    खुद ही जीत लूँगा
    यह युद्ध भी

    तुम कौन हो?
    समाज या शासन
    बोलो खुद ही

    बन निष्ठुर
    हमे ढ़केल दिया
    काल की ओर…!!

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    7
    5

  • आखिर जो आप मंत्री ठहरे

    लाॅकडाउन बढ़ाते रहो
    अध्यादेश लगाते रहो
    आखिर जो आप मंत्री ठहरे।
    मजदूरों को भगाते रहो
    शराबियों को अजमाते रहो
    आखिर जो आप मंत्री ठहरे।।

  • ओ बीते दिन

    ओ बीते दिन
    ये उन दिनों की बात है,जब बेरोजगारी का आलम पूरे तन मन मे माधव के दीमक में घोर कर गया था,घर की परिस्थिति भी उतना अच्छा नही था कि वे निठल्ला घूम सके…….
    …क्योंकि बाबू जी कृषि मजदूरी करके पूरे परिवार का भरण पोषण कर अपने फर्ज को निभा रहे थे ।
    और इधर माधव गाँव मे ही रह कर पढ़ाई के साथ-साथ अपने माँ के साथ घर के हर कामो में हाथ बटाते.और इसी तरह उन्होंने हायर सेकेंडरी स्तर तक कि पढ़ाई पूरा कर लिए……….और कुछ दिनों बाद निजी विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य करने लगा.लेकिन कब तक अल्प वेतन मे जिंदगी की गाड़ी कैसे चल सकता है | एक तो जवान बेटा है………..कई बार तो अपने माँ बाप के ताने सुनना पड़ता था,माधव के मन मे निराश के बादल छा जाते लेकिन अपने मन को डिगने नही दिया…………….अपने दोस्तों के साथ मन में उठने वाले पीड़ा को बाँट कर मन के दुख को हल्का कर लेते और आगे के बारे में सोंच कर उमंगता के साथ कार्य मे जुट जाते…………….. “मन के हारे हार है,मन के जीते जीत”
    यही भाव लेकर हमेशा चलता.और रोज अखबारों में इस्तिहार को देखेते कहीं अपने लायक रोजगार तो न निकला हो एक दिन अखबार के माध्यम से शहर के एक स्कूल में चपरासी का पद निकला था. वेतन भी कुछ अच्छा था साथ ही साथ शहर की बात है.माधव सोचने लगा और मन मे कुछ नया करने का विचार लाया…………और चपरासी के लिए अपना आवेदन डाक के द्वारा भेज दिया,ओ तो ईश्वर के अच्छे कृपा माने या अपना शौभाग्य,कुछ दिनों बाद उनको नौकरी का आदेश मिल गया,परिवार में खुशी का माहौल छाने लगा क्योंकि होना भी चाहिए बेटा का जो नौकरी लगने वाला है,माधव खुशी-खुशी माँ बाप का आशिर्वाद लेकर शहर की ओर नौकरी करने चल पड़ा……..ओ पहला दिन जैसे-तैसे अपने पद के ज्वानिंग करने स्कूल के कार्यालय में गया…….
    ज्वानिंग जैसे ही किया और वहाँ के प्राचार्य से मिलने गया……..तो प्रचार्य के हिड़कना उनके ऊपर मानो ऐसे बिजली गिरा हो जैसे माधव यहाँ आ कर कोई पाप कर गया हो,क्या पद ही ऐसा होता कि कोई छोटे कर्मचारिय का सम्मान न हो …………माधव आवक स रह गया और अपना कार्य ईमानदारी के साथ करने लगा……लेकिन चपरासी के पद उनको हर समय खलने लगा और वह कमर कस लिया कि मुझे इससे अच्छ पदों में कार्य करना है……………..और अपने योग्यता में विस्तार करते गया,कभी-कभी अन्य कर्मचारी के खीझ को सुनता,प्राचार्य का डाँट ऐसा लगता मानो कोई सीने मे भाला बेद रहा हो………………..
    ये सारी बात को माधव एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर अपने कार्य मे लगा रहा । और एक दिन उच्च पद में जाने का अवसर प्राप्त हुआ ……………लेकिन माधव को हर समय ओ बिता हुआ पल को याद कर यही सोचते क्या छोटे कर्मचारी,कर्मचारी नही होते क्या वे सम्मान के पात्र नही है इसी तरह उनके साथ व्यवहार किया जाता है ………………..यही सोच कर मन मे कई सारे प्रश्न उठने लगता और ओ बीते दिन याद कर बार-बार अपने आप से प्रश्न करता अरे ओ मेरे बीते दिन ………

    योगेश ध्रुव भीम

  • मजदूर हूँ मैं

    मजदूर हूँ मैं
    मजबूर नहीं।
    नहीं कभी चिंता
    अपन रोटी की
    सबका घर मैं
    भरना चाहूँ।
    चिलचिलाती धूपों ने जलाया,
    कभी बारिश के पानी ने भींगाया।
    कपकपाती ठंढी से भी लड़ना चाहूँ।।
    क्योंकि मजदूर हूँ मैं।।
    किसानी से कारखाना तक
    अपनी सेवा का क्षेत्र बड़ा है।
    अपने हीं दम पर तो
    व्यापारियों का व्यापार खड़ा है।।
    कर्तव्य बोध के कारण
    अपनों से दूर हूँ मैं।।
    सेवा धर्म है अपना
    क्योंकि मैं मानव हूँ।
    सेवा के हीं खातिर
    कष्ट उठाऊँ न हीं श्रम का दानव हूँ।।
    एक मजूरी दे ‘विनयचंद ‘
    कह दे जग में नूर हूँ मैं।
    मजदूर हूँ मैं।।

  • कॉर्पोरेट दुनिया

    मुझमे थोड़ी सी अच्छाई, शायद बाकी है
    इस लिए ठोकरे राहों में बेसुमार है

    मुझमे तेरी पड़छआई शायद बाकी है
    की आज भी टिका हुआ हूं

    जीवन के इस चक्रव्यू फसते जा रहा हूँ
    कौन दोस्त और कौन शत्रु में भौचक्का सा हो रहा हु

    उम्मीद की लौ धुमिल सी दिख रही है
    ज़िंदा हु क्यों की तेरे साथ होने पे ऐतबार है

    राजनीति आफिस की रास ना आती
    हम मज़दूर है सतत संग्राम ही हम को भाती

  • हौसला

    हौसला

    ‘बिन मेहनत के रोटी नही मिलती,गरीब के घर मे खुशियाँ नही सजती।

    हौसलों के पंख से उड़ान कितनी भी भर लो,पर पेट की भूख नही मिटती। 

    फौलादी इरादों से साँसो का दामन थाम रखा है,वरना यहाँ मौत भी आसान नही मिलती। 

    सुना है सारा संसार रंगोत्सव मना रहा है,पर यहाँ कोरी किस्मते कहाँ रंगती। 

    जद्दोजहद है जिन्दगी मे कि किसी दिन सुकून मिलेगा,उसी दिन सतरंगी यह चेहरा भी सजेगा। 

    मजबूरी मे मजदूरी कर मजबूरी से निपटते है,हम गरीब होली पर भी पसीने से ही रंगते है।’ 

  • कड़वाहट

    कड़वाहट

    दुनिया मे जो है कड़वाहट वह मिर्च पर भारी है,

    मेरे जीने का हुनर मेरी मौत पर अब भारी है। 

    दिन भर मजदूरी करके अपना परिवार पालता हूँ, 

    इस तरह आराम पर मेरी मेहनत बहुत भारी है। 

    सुख की अनुभूति हो इतनी कभी फुरसत ही नही मिलती, 

    सुकून नही मिलता क्योंकि मुझ पर जिम्मेदारियां बहत भारी है। मुझे आराम के लिए घर या मुलायम बिस्तर नही चाहिये, 

    तुम्हारे चैन,सुकून पर मेरी बेपरवाह नींद बहुत भारी है। 

    उम्र है ढ़लान पर फिर भी अजीब सा जूनून रखता हूँ, 

    ये दुनियावालो तुम्हारी जवानी पर मेरा बुढ़ापा बहुत भारी है। 

  • मजदूरो के बच्चे

    मेरे घर के सामने
    मजदूरो का जमावड़ा लगा था
    ईंटो का ढेर बड़ा था
    शायद कोई बंगला बन रहा था.

    कोई मजदूर ईंटे ढो रहा था
    कोई दीवार चिन रहा था
    हर मजदूर काम मे लगा था
    बच्चों की कोई परवाह नहीं कर रहा था.

    हम अपने बच्चों को
    धूल भी नहीं लगने देते है
    और मजदूरो के बच्चे देखो
    किस तरहा मिटटी मे लेटे है.

    मिटटी उड़ा उड़ा कर
    खेल रहे है मजदूरों के बच्चे
    सब अपने कर्मो का खाते
    ये कहते है हम वचन सच्चे

    गाढ़ा पसीना बहाया
    अपने परिवार के लिए कमाया
    शाम को खरोंच भरे हाथों से
    बच्चे को गोद मे उठाया.

    म से मिटटी म से मजदूर
    नाता मिटटी से गहरा है
    कितना शोर मचा ले बेचारे
    ना सुनेगा उनकी, समाज हमारा बहरा है.

  • दलित

    इस आजाद भारत में
    आज भी मेरी वही दशा है.
    छुआ – छूत का फंदा
    आज भी मेरे गले में यूहीं फंसा है.
    मै हूँ दलित गरीब
    भेदभाव का शिकंजा मेरे पैरो में कसा है.
    मै तिल तिल कर जी रहा
    समाज मेरे बुरे हाल पर हंस रहा है.
    ये मत भूलो, जिस घर में तुम हो रहते
    वो मेरी दिहाड़ी मजदूरी से ही बना है.

    फसल उपजाऊ सबकी भूख मिटाऊँ
    पर खुद भूख से मै ही लड़ता हूँ.
    साथ चलने का हक़ भी मै ना पाऊं
    पर सबके उठने से पहले सड़के साफ मै ही करता हूँ.
    जात के नाम पर वोटो से कितना खुद को बचाऊ
    पर राजनीती का अखाडा मै ही बनता हूँ.
    महलो तक का भी निर्माण मैंने किया
    पर आज भी मै झोपड़े में ही बसता हूँ.
    हजारों इमारतें बना चुका
    पर एक ईंट जितना मै सस्ता हूँ.

    हजारों साल हो गए सहते -सहते
    नींच जात होने के अपमान मे
    ना कभी आगे बढ़ने दिया
    अछूत होने के गोदान ने
    जाने क्यों रोंद कर रखना चाहा
    पैरो तले इंसान को ही इंसान ने
    अब समानता का अधिकार
    मुझे दिया है सविधान ने
    उससे पहले तो जीने का हक
    मुझे दिया है उस भगवान ने

    🌋🌋🌋नीतू कंडेरा🌋🌋🌋🌋

  • साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता

    उठी है एक आवाज, सत्ता को पलटने के लिए,
    जागी है एक भावना,जन जन की चेतना के लिए,
    गूंजी है एक पुकार,कुछ बदलने के लिए,
    अब समाप्त करनी है लोगों में फैली जो है भ्रांति,
    समय आ गया है अब जन्मेगी एक क्रांति,
    आगाज़ करता हुआ एक विगुल कह रहा,
    डरो ना आंधी पानी में,
    हर फिजा खुल कर सांस लेगी अब इस कहानी में,
    मजदूरों और मेहनतकशों के इम्तिहानों की,
    अब लाल सलाम करती हुई उठेगी एक क्रांति हम जवानों की,
    हुई थी क्रांति और होगी एक क्रांति,
    अब एक जलजला उठ रहा है मजदूरों और मेहनतकशों के नारों का,
    हर हिसाब चुकता होगा अब पूंजीपतियों और शासकों की मारों का,
    देखो उस परिवर्तनकारी दृश्य को,
    जो बन रहा है इस जहान में उस मैदान में,
    ख़त्म होगी अब जो भी है भ्रांति,
    अब जन्मेगी क्रांतिकारी क्रांति ।

    अंशिका जौहरी

  • इज्जत

    इज्जत

    इज्जत के बचावे खातिर
    मालिक घर को तोडे या जोडे।

    मालिक अपनी सुझ बुझ से
    घर वाले को सडक पर कर सकता है ।

    मैं मालिक हूॅ अपने घर का
    मेरे लिए कोई कानुन नही।

    मेहमान का इज्जत करने के लिए
    मालिक कर्म धर्म से जुटता है।

    सही गलत का पहचान करके
    घर की इज्जत को समेटता है।

    भष्टाचार मंहगाई की चादर को
    ओढकर घर का मालिक बीताता है।

    मेहनत मजदूरी करके मालिक
    घर के इज्जत को परदे तले रखता है ।

    मेरे दिल को ना तोडो परिवार वालो
    क्योंकि मेरा भी कुछ इज्जत है समाज में।

    महेश गुप्ता जौनपुरी
    मोबाइल – 9918845864

    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍

  • Mera Sauk nahi hai majduri

    मेरा शौक नहीं है मजदूरी ,
    बस हालात की है मजबूरी,
    चाहे हो चिलचिलाती धूप ,
    चाहे हो कड़ाके की ठंड ,
    चाहे हो सावन की बरसात,
    आप बैठे थे एसी कूलर में,
    हम कर रहे थे मजदूरी ,
    मेरा शौक नहीं है मजदूरी,
    बस हालात की है मजबूरी,
    रहने को अपना घर नहीं,
    हम महल बना कर देते हैं,
    बस इतनी सी इच्छा रखते हैं |
    मेरे बच्चे ना रहे भूखे
    उनके भी अरमान कुछ पूरे हो
    तालीम पा सके आप की तरह
    है फटे कपड़े तन पर मेरे
    पर खुशियों की चाहत रखते हैं
    मिले उचित मजदूरी हमें
    बस इतनी सी चाहत रखते हैं

  • किसान

    किसान

    हाँ मैं ही हूँ किसान साहब
    जो खोतो में काम करता हैं
    बैल को भाई मानता
    खेत को धरती माता
    हल को पालन हार मानता
    जीवन को खेत में निकाल देता
    शहर से कोशो दुर हूँ मैं
    खेत में मैं लीन हूँ
    आपके जैसी शान नहीं हैं मेरी
    फिर भी तुम कर्जदार हो मेरे

    चुभन होती हैं साहब मुझको भी
    जब कोई मजदूर बोलता हैं
    मजदूर नहीं हूँ मैं किसान हूँ
    देश का प्रधान सेवक हूँ
    मुझे नहीं आती चापलुसी
    नहीं मिलती खबर अखबार की
    खेतो में लगा रहता हूँ
    इसीलिए अनपढ़ गँवार हूँ
    मैं सेवक हूँ अन्नदाता हूँ
    फिर भी मेरा कोई पहचान नहीं

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • हम खुद काम जल्दी कराने के लिये रिश्‍वत देते है

    “हम खुद काम जल्दी कराने के लिये रिश्‍वत देते है

    फिर देश मे भ्रष्‍टाचार बहुत है ये सोच कर हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हम होटलो मे बढी ही शानसे छुटु को आवाज़ देते है

    फिर बाल मजदूरी की बात करते समय हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी अपने एरिया , मोहल्ले,कॉलोनी की सफाई के बारे मे नही सोचा

    तो स्‍वछता रॅंकिंग मे हमारा शहर पीछे है ये जानकर हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी सामने हो रही छेढ़ खानी का विरोध नही किया,

    तो देश मे महिलाये सुरक्षित नही है ये बोलते समय हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी पुलिस की किसी केस को सुलझाने मे मदद नही की,

    फिर यहाँ इंसाफ नही मिलने पर हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी नियमो की परवाह नही की,

    फिर यहाँ कोई अनुशासन नही है,इस बात से हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी चुनाव वाले दिन को एक छुट्टी से ज्यादा कुछ नही समझा,

    तो राजनीति का हाल बहुत खराब है, इस विचार से हमे बुरा क्यो लगता है………….

    एक मोबाइल लेते समय इतना सोचते है,और देश से जुढ़े मसलो मे कभी एक मिनिट भी सोचने की ज़रूरत महसूस नही की,

    फिर देश की सरकार कुछ नही सोचती ये हमे बुरा क्यो लगता है………….

    हमने कभी देश के लिये कुछ करना नही चाहा ,

    फिर चाय के स्टॉल पर ये कहते समय की इस देश का कुछ नही हो सकता हमे बुरा क्यो लगता है………….

  • इश्क में मिली मजदूरी….

    गम और तन्हाई का साथ नहीं मजबूरी हैं साहिब
    ये और कुछ नहीं इश्क में मिली मजदूरी हैं साहिब….!!

    -देव कुमार

  • सुनी सुनी सी बात लगे इस बस्ती में

    सुनी सुनी सी बात लगे इस बस्ती में

    सुनी सुनी सी बात लगे इस बस्ती में,

    कुछ तो है जो ख़ास लगे इस बस्ती में,

    कभी सोंच आज़ाद लगे इस बस्ती में,

    कभी हालत नासाज़ लगे इस बस्ती में,

    मालिक ही का राज चले इस बस्ती में,

    बाकी सब लाचार बचे इस बस्ती में,

    पैसों की ही बात रखे इस बस्ती में,

    अब कोई दिल न साफ़ रखे इस बस्ती में,

    आँखों में ही ख्वाब सजे इस बस्ती में,

    दिल के कितने राज़ दबे इस बस्ती में,

    कहने को कुछ यार बचे इस बस्ती में,

    अब मजदूर कुछ दो चार बचे इस बस्ती में।।

    राही (अंजाना)

  • “मजदूर”

    ********************

    अपनी सांसों में उर्जा भरकर

    निर्माण जो करता नवयुग का

    औरों को सुख-सुविधा देकर

    करे सामना हर दुख का

    जो रूके अगर, रूक जाए दुनियां

    सारे जग का रीढ़ वही

    जोश, लगन, संकल्प है जिनमें

    फुरसत में आराम नहीं

    हिम्मत जिनकी शान है यारों

    मेहनत जिनकी है पूजा

    कर्तव्य निभाना लक्ष्य है जिनका

    मजदूर है वो, कोई और न दूजा

    *************************

  • ” मजदूर “

    अपनी सांसों में उर्जा भरकर

    निर्माण जो करता नवयुग का

    औंरों को सुख-सुविधा देकर

    करे सामना हर दुख का

    जो रूके अगर, रूक जाए दुनिया

    सारे जग का रीढ़ वही

    जोश, लगन, संकल्प है जिनमें

    फुरसत में आराम नहीं

    हिम्मत जिनकी शान है यारों

    मेहनत जिनकी है पूजा

    कर्तव्य निभाना लक्ष्य है जिनका

    मजदूर है वो, कोई और न दूजा

  • Civil engineer

    Being a civil engineer,for all civil engineers…hahahaha..

    गुजारी है ज़िन्दगी मैंने , सीमेंट और रेत मिलाने में

    कैसे भला कोई इश्क़ करे, हम मजदूरों के घराने में

    अब खुद के सपनों का घर बसाने की हम क्या सोचें

    उम्र कट रही है पूरी, दूसरों का मकाँ बनाने में

    Only for fun…??

  • सच्ची राह पे अगर….

    सच्ची राह पे अगर  तेरा  एक कदम भी नेकी से पड़ा है।

    तो  अगले ही  कदम पे  तेरा रब तेरे साथ में खड़ा है।

     

    उसकी  फिक्र का  दिखावा करने वाले तो गुम हो गये

    लेकिन  सच्ची  फिक्र  वाला अभी  भी  उसके  साथ में खड़ा है।

     

    ऩफरत के  जबरदस्त  हमलों से भी  वो कभी हुआ

    जो कमयाब असर  अब प्रेम के अधभुत बाण से पड़ा है।

     

    वो जिंदगी में  सकून कभी  किस तरह कमा सकता है

    हमेशा से ही लालच का सिक्का जिसके मन में जड़ा है।

     

    उद्दण्डता जो की थी पहले उसने वो अब माफ हो गई

    क्योंकि अब वो  पक्केपन से  अपनी मर्यादा पे अड़ा है।

     

    दोनों की परिसीमाऐं  काफी नज़दीक लगती हो लेकिन

    बेवकूफी और बेकसूरी  में फर्क तो वाकई बहुत बड़ा है।

     

    वो तो जिंदगी में भी कभी  मुश्किल ही  जाग पाएगा

    अलार्म के बिना  जो आँख खुलने पे भी सोया पड़ा है।

     

    कारीगर  या  मालिक के हुक्म पे आखिर  मरना ही है

    ये  मजदूर  का  नाम   मज़दूर   यूं  ही  थोड़े  पड़ा  है।

     

    जग ने उसकी तनक़ीद करने में  कोई कसर छोड़ी

    जग को सँवारने का भूत  जिस  बंदेके सिर पे  चढा है।

     

                                                                    कुमार बन्टी

     

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