कहीं से कहीं तलक कोई और नज़र आता नहीं,
बचपन में खेल के सिवाये कोई और भाता नहीं,
कहाँ से शुरू और कहाँ पर खत्म हो जाते हैं लम्हें,
ढूंढने निकलो तो कोई ओर छोर नज़र आता नहीं,
उड़ती हुई पतंग जब हत्थों से कभी कट जाती है,
चरखी में फिर डोर में कोई जोर नज़र आता नहीं।।
राही अंजाना
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