बेटी

रहने को बहुत बड़ा है लेकिन
रहने में क्यों डर लगता है
अपने ही घर में क्यों बेटी
भला तेरा ये मन खलता है।

कहने को तो सब चलता है
सूरज रोज निकलता है
एक तेरी आँखों में क्यों बेटी,
उगता सूरज ये ढलता है।

बढ़ने की चाहत में जो पल
हाथों से रोज फिसलता है
तेरी मर्ज़ी के आगे क्यों बेटी,
लगड़ों का पैर मचलता है।।

राही अंजाना

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