मोहब्बत का फसाना

खो गया था मैं अपने आप में ही
और तेरी याद में तड़पता रहा
इतने सालों बाद तेरी गलियों में कदम रखा
नाम लेकर तेरा पुकारता तुझे भटकता रहा.

इस उम्मीद में कि तुम कहीं तो मिलोगे
मैं जोर से आवाज लगाता रहा
ढूंढा वो चौबारा, देखा वो गलियारा
बार-बार चक्कर तेरे चौराहे के लगाता रहा.

क्या भूल गए लोग
अब हमारी मोहब्बत का फसाना
रवैया ऐसा है उनका
मानो कह रहे हो दोबारा इन गलियों में ना आना.

कहीं से आकर मुझे पत्थर लगा
समझ लिया कि गुजरे जमाने की आहट मिल गई
किसी को आज भी याद है हमारी मोहब्बत
यह सोच दिल को राहत मिल गई.

Comments

11 responses to “मोहब्बत का फसाना”

    1. इल्जाम सभी अपने ऊपर लेते हैं बेरहम जमाने के,
      मोहब्बत करने वाले तो
      बस बहाने ढूंढते हैं पत्थर खाने के

    1. nitu kandera

      धन्यवाद

    1. nitu kandera

      धन्यवाद

    1. nitu kandera

      धन्यवाद

      1. कोई बात नहीं

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