बज़्म

जीने को यूँ जीती हूँ जैसे
कोई गुनाह किये जा रही हूँ मैं।
गीत भी गा रही हूँ,
ईद भी मना रही हूँ।
ज़िन्दगी की बज़्म फ़िर सजा रही हूँ मैं।

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