मरहम बन जाओ तुम
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ज़ख्मों को जलाओ तो
कुछ उजाला हो।
ख़ाक हो जाए हम
किनारा हो।
घाव की आह में
सिसकियां बाकी,
मरहम बन जाओ तो
सहारा हो ।
ये दिल था ही नहीं
अपना शायद
डी.एन.ए जांच लो
शायद कहीं तुम्हारा हो।
जानें उल्फत ने
उलझाया इस कदर
गोया ये दिल, दिल ना हो
बेचारा हो।
यादों का सिलसिला
ना हो गर तो
कैसे इस उम्र का गुज़ारा हो।
लम्हा लम्हा सजीव लगता है
हम बिछड़ चुके
सोचना भी अजीब लगता है।
जैसे ये शब्द, शब्द ना हो
सटीक निशाना हो।
तेरा मेरा रिश्ता बड़ा पुराना हो।
प्यार है अब भी तुम्हे हमसे
उतना ही
इसी भ्रम में जिए तो
कुछ गुज़ारा हो।
तुम उड़ों अपने आसमानों में
जिस शाख पे रुको
पल दो पल के लिए
काश उसी शाख पे
अपना भी एक ठिकाना हो।
निमिषा सिंघल

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