तुम झूठ किसी और दिन बोलना

सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता 
कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता 
जब भी विरोधाभास का आभास हुआ 

हम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले 
अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलना 

फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
तुम झूठ किसी और दिन बोलना
तुम झूठ किसी और दिन बोलना

हमने फिर भी बेरुखी नहीं अपनायी 
लाख चाहे लफ़्ज़ों के हेर फेर की 
अक्सर बेतरतीबी से चोट खायी 

लेकिन सम्मान देने की खातिर 
हमने कभी फटे में टांग न अढ़ाई 

क़श्मक़श में दिल से जो बात की
बस अपने दिल से ये आवाज़ आयी 

कभी अपने इस बड़ी कमज़ोरी का 
तुम राज़ किसी के आगे नहीं खोलना

फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए 
झूठ किसी और दिन बोलनातुम
तुम झूठ किसी और दिन बोलना

Comments

14 responses to “तुम झूठ किसी और दिन बोलना”

    1. Anita Sharma

      Thanks sir🙏🏼

  1. Satish Pandey

    लाज़बाब

    1. Anita Sharma

      Thanks sir🙏🏼

  2. Alok Kumar Avatar

    बहुत खूब

    1. Anita Sharma

      Thanks sir🙏🏼

    1. Anita Sharma

      Thanks anshita

    1. Anita Sharma

      Thank you🙏🏼

    1. Anita Sharma

      Thank you🙏🏼

  3. Satish Pandey

    Bahut khoob

  4. अति उत्तम रचना सत्य सत्य ही होता है और झूठ ज्यादा दिन नहीं टिकता

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