जब सावन के एक एक बूंद,
अंबर से धरती पे गिरती है।
तब न जाने क्यों ए ग़ालिब,
अश्क मेरी गालो को भिगोती है।।
न जाने क्यों
Comments
4 responses to “न जाने क्यों”
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Good
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स्त्रीलिंग का प्रयोग ध्यान रखकर किया कीजिये
बाकी सुन्दर रचना -
Nice
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रचना
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